बढ़ा रहा हूँ हर एक कदम मंज़िल की जो राह पे
जंहा नही चाहता निकल पड़ा हूँ वँहा पहूंचनेकी चाह में
हो रहा है अफ़साना नाकामयाबी और कामयाबी का इस राह पे
कामयाबी से ज्यादा नाकामयाबी भरोसा दिलाती मुझको खुद पे
देख रहा यँहा इस ज़ालिम दुनिया मे में
हर कोई मर मर के जी रहा कल दिल भरके जीने की आश मे
जो नही करना वह करता जा रहा है रखके स्मित लब्जों पे
जो जी रहा है उसके ख्वाब देखके बोले क्या नशिब लेके जन्मा वो अब्जो के
जान ने की कोशिश ना की उसने कल के महेल की किम्मत क्या आज है
शायद एक टाइम का खाना साथ बेठ के ना खाने मे क्या राज़ है
Just Amazing
ReplyDeleteThank you for appreciation
DeleteWonderful!!!!
ReplyDeleteThank you
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